Tuesday, April 13, 2021

INA song Bharat Bhagya Vidhata

 Very rare Record of India sung by Dr Col Laxmi  Swaminathan, who later became Dr Laxmi सहगल Dr Laxmi सहगल  had done her MBBS IN 1938 and DGO IN 1939. SHE WAS  CLOSELY ASSOCIATED WITH SUBASH CHANDRA BOSE & JOINED AZAD HIND फौज OR INDIAN NATIONAL ARMY AS CAPTAIN AND LATER PROMOTED TO COL. SHE WAS MINISTER OF WOMEN AFFAIRS OF  GOVERNMENT OF INDIA FORMED BY AZAD  HIND फौज.

INA Chief Subhash Chandra Bose himself altered the lyrics of Jana Gana Mana.... originally penned by Tagore.
जन गण मन SONG IN लक्ष्मी सहगल VOICE  TAKEN FROM 78 RPM RECORDS MADE FOR AZAD HIND फौज (INDIAN NATIONAL ARMY) FOR OUR INDEPENDANCE STRUGGLE.

Saturday, April 10, 2021

इस्लाम क्या है -- अबेटमेंट टू क्राइम ? -- शंकर शरण

अमानुल्ला खान, जरा कुरान में झाँकें!

शंकर शरण

आम आदमी पार्टी के नेता अमानुल्ला खान ने 3 अप्रैल 2021 को एक ट्वीट किया। उन के शब्द हैं, “हमारे नबी की शान में गुस्ताखी हमें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं, इस नफरती कीड़े की जुबान और गर्दन दोनो काट कर इसे सख़्त से सख़्त सजा देनी चाहिए। लेकिन हिन्दुस्तान का कानून हमें इस की इजाजत नहीं देता, हमें देश के संविधान पर भरोसा है और मैं चाहता हूँ कि दिल्ली पुलिस इस का संज्ञान ले।” उन्होंने किसी का नाम नहीं लिखा, पर उनके ट्वीट के साथ किसी कार्यक्रम की तस्वीर थी। जिस से लगता है कि वे कहीं किसी के द्वारा कही बात पर नाराज थे।

अच्छा हो, कि दिल्ली पुलिस ही नहीं, देश के सभी लोग यह भी संज्ञान लें कि भारतीय कानून न केवल किसी की गर्दन काटने, बल्कि सार्वजनिक रूप से ऐसी बातें कहना भी अनुचित मानता है। अमानुल्ला हिंसक धमकियाँ देते हुए भी कानून-पाबंद बन रहे हैं।

लेकिन अधिक महत्व का विचारणीय बिन्दु अन्य है। जिस पर हमारी न्यायपालिका, संसद, तमाम राजनीतिक दलों को भी ध्यान देना चाहिए। कि क्या इस्लाम और उन के प्रोफेट का ही सम्मान होना चाहिए? खुद इस्लाम दूसरे धर्मों, उन के देवी-देवताओं, अवतारों, पैगम्बरों, श्रद्धा-स्थलों, श्रद्धा-प्रतीकों के प्रति क्या रुख रखता है? वह मुसलमानों को सिखाता क्या है?

निस्संदेह, इस्लाम दूसरे धर्मों को ‘कुफ्र’, और उन्हें मानने वालों को ‘काफिर’ कह कर अंतहीन घृणा और हिंसा सिखाता है। यह केवल किताबी हुक्म नहीं, बल्कि उस के अनुयायी व्यवहार में गत चौदह सौ सालों से यही कर भी रहे हैं। मक्का से लेकर ढाका तक, और कौंस्टेंटीनोपुल से लेकर कोलंबो, और बाली तक यही उन का इतिहास और वर्तमान है।

अमानुल्ला खान नोट करें – धर्मों, विश्वासों, श्रद्धा-प्रतीकों, श्रद्धा-स्थलों का सम्मान बराबरी से ही हो सकता है! क्या मथुरा, काशी, भोजशाला में जाकर उन्होंने देखा है कि हिन्दू सभ्यता के सब से महान श्रद्धाप्रतीकों भगवान शिव, भगवान कृष्ण, और देवी सरस्वती के सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिरों के साथ इस्लाम के अनुयायियों ने क्या किया – और आज भी कर रहे हैं? क्या अमानुल्ला को मालूम नहीं कि नाइजीरिया, सूडान से लेकर पाकिस्तान, बँगलादेश तक गैर-मुसलमानों के साथ इस्लाम के आम अनुयायी क्या कर रहे हैं?

विविध धर्मों का सम्मान केवल बराबरी से हो सकता है। इसलिए, अमानुल्ला खान को सबसे पहले अपने मजहब के गिरहबान में झाँक कर देखना चाहिए कि वह दूसरे धर्मों, देवी-देवताओं, मंदिरों, चर्च, सिनागॉग, गुरुद्वारे, मठ, और अनुयायियों के प्रति क्या सीख देता और व्यवहार रखता है?

ताकि वे किसी ‘भटके हुए’, ‘मुट्ठी भर मुसलमानों’ वाला बहाना न बनाएं, इसलिए मूल स्त्रोत कुरान को ही उलट कर देखें। सब से प्रमाणिक अंग्रेजी पाठ (मुहम्मद पिकथॉल) या हिन्दी पाठ (मकतबा अल-हसनात) से ही मिलान कर के देखें। कि कुरान गैर-मुसलमानों या काफिरों और उन के देवी-देवताओं को क्या कहता है।

वस्तुतः कुरान ही काफिर को परिभाषित करता है, कि जो अल्लाह और उन के प्रोफेट मुहम्मद को स्वीकार न करे, वह काफिर है। जिस के प्रति कुरान अत्यंत नकारात्मक भाव रखता एवं प्रेरित करता है। कुरान (2:216) ने मूर्तिपूजा को हत्या से भी गर्हित पाप बताया है। कुरान में मूर्तिपूजकों को ‘जानवर’, ‘अंधे’, ‘बहरे’, ‘गूँगे’, (2:171) और ‘गंदे’ (22:30), ‘बंदर’, ‘सुअर’ (5:60) आदि की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार, हिन्दू, बौद्ध, जैन, आदि लोगों को सर्वाधिक घृणित मानना सिखाता है। विश्व के सब से प्राचीन, सम्मानित और लगभग पौने 2 अरब लोगों के धर्मों के प्रति यह कैसा सम्मान है? इस के बदले अमानुल्ला खान किस आधार पर इस्लाम के लिए सम्मान की माँग करते हैं?

नोट करें, कुरान में वे बातें कोई अपवाद या इक्की-दुक्की नहीं। उस में आधी से अधिक सामग्री काफिरों पर ही केंद्रित है। जिस में काफिरों के प्रति एक भी अच्छी बात नहीं। काफिर से घृणा की जाती है (98:6, 40:35); काफिर का गला काटा जा सकता है (47:4); मार डाला जा सकता है (9:5); काफिर को भरमाया जा सकता है (6:25); काफिर के खिलाफ षड्यंत्र किया जा सकता है (86:15); काफिर को आतंकित किया जा सकता है (8:12); काफिर को अपमानित किया जा सकता है (9:29); काफिर को दोस्त नहीं बनाया जा सकता (3:28); काफिरों से दोस्ती करने पर मुसलमान को अल्लाह दंड देगा (4-144); जब मुसलमान मजबूत हों तो काफिरों से कदापि शान्ति-सुलह न करें (47: 35); आदि।

कुरान में दूसरे धर्मों, उन के देवी-देवताओं को झूठा कहा गया है। उस के शब्दों में, “एक मात्र अल्लाह सच है, और दूसरे पुकारे जाने वाले देवी-देवता झूठ हैं।” (22:62)। इसी प्रकार, “मुसलमान सत्य पर चल रहे हैं और काफिर झूठ पर।” (47:3)। यही नहीं, अल्लाह के सिवा अन्य देवी-देवताओं को ताना दिया गया है कि उन्हें बुला कर देख लो, बेचारे क्या कर सकते हैं तुम्हारे लिए (7: 194-195)।

कुरान अन्य धर्मों के देवी-देवताओं को निकृष्ट, व्यर्थ बताता है, “जो न किसी को लाभ पहुँचा सकते हैं, न हानि” (25:55)। कुरान के अनुसार जो अल्लाह को न मानकर झूठे ईश्वर मानते हैं, वे झूठे ईश्वर अपने अनुयायियों को प्रकाश से अँधेरे की ओर ले जाते हैं (2:257)। वे जहन्नुम की आग में जाएंगे और वही रहेंगे। आगे, “मुसलमानों का संरक्षक अल्लाह है, काफिरों का कोई संरक्षक नहीं है।” (47:11)।

वस्तुतः, कुरान दूसरे धर्म मानने वालों को भी हर तरह की कटु बातें और अपशब्द कहता है। जैसे, “अल्लाह काफिरों का दुश्मन है” (2:98)। कुरान के अनुसार, “जो हमारी आयतों को नहीं मानते, वे बहरे, गूँगे और अँधे हैं।” (6:39)। इस बात को दुहराया भी गया है। कुरान में अल्लाह कहते हैं, कि “हम ने बिलकुल साफ संकेत (आयतें) भेजी हैं, और केवल बदमाश ही उस से इंकार करेंगे।” (2:99)। उन की खुली घोषणा है कि “काफिरों के लिए दुःखदायी यातना तय है।” (2:104)। साथ ही, “अल्लाह का संदेशवाहक सभी रिलीजनों पर भारी पड़ेगा, चाहे मूर्तिपूजक इसे कितना भी नापसंद क्यों न करें।” (9:33)।

दरअसल, काफिरों के प्रति घृणा और हिंसा के आवाहन कुरान और प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी (सीरा) में निरंतर दुहराई गई बात, सिग्नेचर-ट्यून जैसी है। अल्लाह खुद कहता है कि कुरान ‘चेतावनी’ और ‘मेरी धमकी’ है (50:45)।

तो जनाब अमानुल्ला खान, इसे देखते हुए काफिरों का क्या कर्तव्य बनता है? अपने को कोसने वालों को, अपने घोषित दुश्मन को कोई कैसे सम्मान दे सकता है! यदि सीरा और हदीस को मिलाकर पूरा आकलन किया जाए, तो इस्लाम का एक मात्र लक्ष्य है – जैसे भी हो काफिरों का खात्मा। इतने तीखेपन से कि मुसलमानों को अपने सगे-संबंधियों तक से दुराव रखने के लिए कहा गया है। धमकी के साथ।

कुरान में साफ निर्देश है, ‘‘ओ मुसलमानों! अपने पिता या भाई को भी गैर समझो, अगर वे अल्लाह पर ईमान के बजाए कुफ्र पसंद करते हों। तुम्हारे पिता, भाई, पत्नी, सगे-संबंधी, संपत्ति, व्यापार, घर – अगर ये तुम्हें अल्लाह और उन के प्रोफेट, तथा अल्लाह के लिए लड़ने (जिहाद) से ज्यादा प्यारे हों, तो बस इन्तजार करो अल्लाह तुम्हारा हिसाब करेगा।’’ (9: 23,24)।

सो, अमानुल्ला खान अच्छी तरह सोचें, कि धर्मों का मान-सम्मान एकतरफा नहीं हो सकता। आज नहीं तो कल, तमाम ईमामों, अयातुल्लाओं, और उलेमा को दुनिया भर की मस्जिदों से खुली घोषणा करनी होगी कि कुरान में दूसरे धर्मों, देवी-देवताओं, और उन्हें पूजने वालों को जो अपशब्द कहे गए हैं, वे अब खारिज, कैंसिल हैं। मुसलमानों को उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो एकतरफा इस्लाम को आदर की माँग करने का हक नहीं रखते!

लेखक : शंकर शरण

Tuesday, April 6, 2021

COUNTRY OR CONSTITUTION? -- rsingh

 COUNTRY OR CONSTITUTION?


NB: Country is Bharat. Constitution is “Sarkar”!
Normally they are in synchronised harmony as in the United Kingdom and the United States. In short:
WILL OF THE (ENLIGHTENED & FREE) PEOPLE IS THE WILL OF THE GOVERNMENT. AND THE WILL OF SUCH GOVERNMENT IS THE CONSTITUTION.
 
For example, today a Hindu nationalist and a foremost patriot Shri Narendra Modi is the Prime Minister as per Constitution, and his loyalty to COUNTRY and its PEOPLE is beyond doubt.

Could someone like Mohammed Ali Jinnah come up to Mr Modi and demand Partition? HE WILL BE IN HANDCUFFS IN NO TIME!

Yet in 1940 (till 1947) Mr Jinnah stood tall &  defiant for PARTITION, having sensed Power VACUUM created by appeasing pacifist Mr MK Gandhi. He threatened “rivers of blood” and “civil war” if ignored or refused. Neither “stalwart” Gandhi nor Barrister Nehru missed a wink during sleep! They both enjoyed baby’s sound sleep every night till August 1947 when they suddenly woke up. Water had gone over their heads. The country was doomed!

After the bloody Partition, one became the inspiration and the “guiding light” of “Broken” Bharat, the other the "Government of India"!

Now the question arises, “Did they, especially Nehru, since Gandhi was eliminated soon afterwards by a patriot, have the moral or Constitutional right, or authority, to order the army to vacate their forts and fortresses across the Western frontier and withdraw down to Wagah/Atari in the middle of our Punjab, and similar despicable treatment meted to to Bengal? India’s two grand provinces, each the size of France or Germany, lay bisected, and left bleeding with the Hindus being ethnically cleansed.

The question is, “Who commanded the ULTIMATE loyalty of the Indian Armed Forces? Our eternal COUNTRY (INDIA) OR the transient GOVERNMENT of Nehru, or Nehru himself that was "here today and gone tomorrow"?

Thereafter, in January 1948, did Nehru, the anglicised “Brown Sahib”, an alien among the natives (mostly Hindus), have the authority, moral as well as constitutional, to stop our ADVANCING Army from recovering North Kashmir from the enemy, and declare “cease-fire”?
 
I submit he had as much right and authority to order the Army to withdraw as did Emperors Babur and Aurangzeb or Tipu Sultan, the “Constitutional” heads of Hindusthan at the time. An ALIEN imposed on top cannot have any right of the kind!
 
Hence the post-Partition Government of “mutilated” Bharat (India) was ILLEGAL. Only Referendum could grant it the legitimacy and the authority of the People! Referendum never took place. Hence the borders of Bharat (since 1947) are illegitimate and unacceptable!

There could be NO “proper” government of India if there was NO "proper" India that now extends from Wagah to Hoogly, MINUS Khyber Pass and Chittagong!

The present day Bharat has eternal LEGAL claim over that (pre Partition) India, and the claim is not time barred! Why is Bharat collapsed, or reconciled, ready to remain a mere FRAGMENT of the ORIGINAL?

Constitutional scholars may ponder over this, and issue guidelines for the FUTURE of Hindusthan to the present “SARKAR”.

Thinking with a logical head, we discover that Bharat has NO legitimacy as a country. It was recreated by bullies and fraudsters, not by its PEOPLE through Referendum.
 
rajput
4 April 2021

Monday, April 5, 2021

संकेत कुलकर्णी (लंडन) गोडसे- गांधी

 ३० जानेवारी १९४८ ला गांधीहत्या झाली. जगभरातून शोक व्यक्त झाला. हत्या करणाऱ्यांना अटक झाली. खटला चालला. शिक्षा सुनावली गेली. आणि त्याची अंमलबजावणी म्हणून फाशीही झाली. 

ह्याच संदर्भात गांधीहत्येच्या खटल्याचे कागदपत्र वाचताना नथुराम गोडसेंच्या जबानीत मला असा एक एक उल्लेख आढळला की, “...जानेवारी १९४८ मध्ये गांधींनी सुरु केलेला उपवास सोडण्यासाठी त्यांनी ज्या ७ अटी ठेवल्या होत्या त्या सर्व हिंदूविरोधी होत्या...” मला खूप विचार करूनही ह्या नेमक्या अटींपैकी एकही आठवली नाही. थोडंफार शोधूनही कुठेच काही मिळालं नाही. आपल्याला शाळेत (किंवा ‘सरकारी’!) इतिहास सांगताना ह्या अटी नेमक्या काय होत्या हे कधीच सांगितले गेले नाही. जानेवारी १९४८ मध्ये गांधी हिंदू-मुसलमान ऐक्यासाठी उपासाद्वारे प्रयत्न करत होते वगैरे वरवरचे उल्लेखच सगळीकडे आहेत. अनेकांनी ते वाचलेही असतील. मग गोडसेंनी त्यांच्या जबानीत असं का सांगावं की त्या सर्व अटी हिंदूविरोधी होत्या? अश्या काय अटी होत्या त्या?

ब्रिटीश लायब्ररीत जुने न्यूजपेपर आर्काईव्झ शोधणं सुरु केलं. १९६६ पासून इंग्लंडमध्ये वास्तव्यास असणारे ज्येष्ठ इतिहाससंशोधक आणि लेखक डॉ वासुदेव गोडबोलेही योगायोगाने नेमका हाच संदर्भ बराच काळ शोधत आहेत असे समजले. 

मग त्याच सुमाराचे सहज कुतूहल म्हणून बाकीचे जुने इंग्रजी न्यूजपेपर्स शोधायला सुरुवात केली. १९ जानेवारीच्या ‘डर्बी इव्हिनिंग टेलिग्राफ’ ह्या वर्तमानपत्रांत गांधींनी उपास सोडल्याची बातमी दिसली आणि सोबत हापण उल्लेख दिसला की त्या सात अटींपैकी एक अट ही होती की सप्टेंबर १९४७ च्या दंग्यानंतर दिल्लीतल्या ज्या ११७ मशीदी ज्यांची (हिंदू आणि शीखांनी) देवळं किंवा घरं बनवली होती त्यांच्या पुन्हा मशीदी बनवण्यात याव्यात. हे वाचून मला नाही म्हटलं तरी धक्काच बसला. एकतर कोणत्याही  भारतीय पेपरमध्ये ह्यातले कोणतेच उल्लेख नसावेत आणि ह्या सात अटी जर सगळ्याच अश्याच असतील तर मग?

हा शोध आता सोडून द्यावा असा विचार मनांत येत असतानाच ‘द यॉर्कशायर पोस्ट’ चा १९ जानेवारी १९४८ चा अंक पहाण्यात आला आणि त्यात ह्या ७ अटी एकदाच्या मिळाल्या. काय होत्या बरं ह्या अटी? खाली मी त्या अटी देतोय. हा अटींवरून ह्या अटी खरंच गोडसेंनी सांगितल्याप्रमाणे हिंदूविरोधी होत्या का हे ज्याचं त्याने ठरवावं. गांधींचे विचार चूक किंवा बरोबर हे ज्याचं त्याने ठरवावं. माझं मत मी सांगणार नाहीये. 

अट १ - दिल्लीजवळच्या मेहरौली येथे मुसलमानांना त्यांचा उरूस साजरा करायची परवानगी असावी. (मेहरौलीत ख्वाजा कुतुबुद्दीनची मशीद होती. दंग्यांत त्याची मोडतोड झाली होती. हिंदू आणि शीखांनी त्याच्या आजूबाजूच्या मुसलमानांना हाकलून लावलेले होते. ह्या ख्वाजा कुतुबुद्दीनचा उरूस २६ जानेवारी १९४८ रोजी व्हायचा होता. पण तो करताना त्यात अडथळे येण्याची शक्यता होती. गांधींना हे नको होते.)

अट २ - दिल्लीतून पळून गेलेल्या मुसलमानांना सुरक्षितपणे परत येऊ द्यावे. 

अट ३ - दिल्लीतल्या ज्या ११८ मशीदींची देवळे बनवण्यात आलेली आहेत त्या मशीदी पुन्हा मुसलमानांना देऊन टाकण्यात याव्यात. 

अट ४ - संपूर्ण दिल्ली मुसलमानांसाठी सुरक्षित बनवण्यात यावी. 

अट ५ - रेल्वेतून प्रवास करणाऱ्या मुसलमानांच्या सुरक्षिततेची हमी देण्यात यावी. 

अट ६ - हिंदू आणि शीखांनी मुसलमानांवर टाकलेला आर्थिक बहिष्कार मागे घेण्यात यावा. 

अट ७ - दिल्लीत उरलेले काही मुस्लिम वस्त्यांचे भाग पाकिस्तानातून आलेल्या हिंदू किंवा शीख निर्वासितांनी वापरू नयेत. 

सोबत ह्या सगळ्या कात्रणांचे फोटोही पहाता येतील. जाताजाता रामायणातल्या एका श्लोकाची मात्र नक्की आठवण करून देऊ इच्छितो:

मरणान्तानि वैराणि निवॄत्तं न: प्रयोजनम् |

क्रीयतामस्य संस्कारो ममापेष्य यथा तव || (रामायण ६ - १०९ - २५)

इत्यलम्!

- संकेत कुलकर्णी (लंडन)


फोटो: ‘टाईम्स ऑफ इंडीया’ १९ जानेवारी १९४८ ज्यात फक्त ७ अटींचा उल्लेख आहे.


१९ जानेवारी १९४८ मधला ‘डर्बी इव्हिनिंग टेलिग्राफ’.


‘द यॉर्कशायर पोस्ट’ चा १९ जानेवारी १९४८ चा अंक आणि त्यातल्या ७ अटी.

Sunday, April 4, 2021

Synopsis-- Webinar onTemples- 4th Apr 2021

 Synopsis of  the Webinar on the topic Temples- on 4th April- in googke meet.


 Temples are the soul of this country .In our land where the human being seeking moksha is the ultimate goal. Our culture tradition, art, music and dance are design for human beings to achieve this goal. This culture  and tradition give us immense strength. Because of its strength it was able to withstood 1500 years invasion of Moguls and British.  Our is the only culture which was able to retain its religion tradition. wherever Moguls and European invaders colonised they converted the native people either into Islam or Christian. We withstood this aggressive invasion because of our spiritual knowledge. This spiritual knowledge which is in temples unfortunately after Independence gone to the hands of government. When Government saying it is secular it should not interfere with  religious affairs of the society. Unfortunately all other religion people were given freedom to manage their own place of worship except Hindus. 

In our own country where 80% to 85% Hindu majority are treated like a secondary citizen . Time has come to stop this kind of attitude and approach of the government. Free Temples from Government and save Great culture and tradition of our Society

Sunday, March 28, 2021

1962 china war

 HOSTILE TO SOVEREIGNTY, FOR THE LAST MUGHAL JAWAHARLAL NEHRU, ‘WE, THE PEOPLE’ WERE MERELY SHEEPS AND GOATS 

Under the cloak of security, details of China Debacle-1962 were hidden under wraps from public. Even Henderson-Brooks Report of NEFA Inquiry was not allowed in public domain. Every democratic country like UK, USA allows all such reports after a specified number of years but the last Mughal that Nehru was as well as his dynastic successors, did not allow even that. A golden opportunity of writing accurate history narrative, arriving at right conclusions and deriving lessons for future was completely lost. Nehru and his bureaucracy were mortally unnerved owing to their brazen incompetence, absence of commitment and conviction. History has a nasty habit of visiting those who tend to ignore it. Uncomfortable questions like nature of border dispute, why Nehru did not settle border dispute in 1954 itself at the time of signing Panchsheel Agreement, why Nehru ordered change of maps in 1954 and on what grounds, why Chinese offer of swap-deal on McMahon Line and Akshai Chin was not accepted, why our defences were so poor, whether Nehru’s unilateral Forward Policy was justified etc. still rattle and provoke so many contemplative minds, are yet to be resolved. Not only accountability could never be established, the last Mughal Nehru did not have moral propriety to step down even after the humiliating debacle.


Impudent, insolent, incorrigible and unshamed Nehru devoid of compunctions not only did not step down but also did not order any worthwhile probe. His real mind-set surfaced when he responded on the issue of nation’s sovereignty to this effect, “What sovereignty ? Sovereignty over what ?” In his view, people in the country were like sheeps and goats, they didn’t deserve to think or raise uncomfortable questions, they should limit themselves to survival instincts and bare means to survive with lowest order of dignity. He was unable to discern national interest from self-interest as anything in the name of national interest did not exist at all. It was all self-interest for him all the way. Not only Nehru brazenly declined to institute an inquiry into ‘Mother’ of all debacles, he raised all sorts of hurdles on functioning of Henderson-Brooks Committee appointed by COAS Gen. Chaudhuri. In spite of all obstacles the committee did such a superfine job that Nehru had to declare it classified, never allowed it into public domain. Not only Prime Minister Indira Gandhi declined to de-classify the report, even BJP Govt. found it too embarrassing for the country to reverse the decision. According to unofficial disclosures by those who accessed the report, wrong maps were submitted to Chinese and a few Bharatiya posts were shown as Chinese posts. And Chinese came over to capture that !! In a way, China War-1962 and subsequent humiliation was in reality invited by the last Mughal Nehru.


Well known journalist Claude Arpi commented, “Unfortunately, historians and researchers have never been allowed access to original materials to write about Nehru's leadership during the troubled years after Independence. It is tragic that the famous 'Nehru Papers' are jealously locked away in the Nehru Memorial Library. They are, in fact, the property of his family! I find it even more regrettable that during its six years in power, the NDA government, often accused of trying to rewrite history, did not take any action to rectify this anomaly. Possibly they were not interested in recent history !”

From the ThinkTop of

Ramakant Tiwari

Friday, March 19, 2021

CAA,NPR & NRC सुजीत भोगले

 CAA,NPR & NRC

मृत्युच्या सावटात सुद्धा जे शाहीनबाग आंदोलन चालू आहे ते थोडे समजून घ्या. हे समजण्याच्या साठी तुम्हाला इस्लाम समजून घेतला पाहिजे. ज्या वेळी हा लेख तुम्ही वाचाल.. 

सर्व सांस्कृतिक शब्द बाजूला ठेवून सांगतो “गोट्या कपाळात जातील”

मोहम्मद पैगंबर यांना मक्का इथे रहाणे अशक्य होऊन बसले होते. ते तिथे अजून काही काल राहिले असते तर तेथील मुर्तीपुजकांनी त्यांची हत्या केली असती. त्यामुळे त्यांनी हिज्राः/ पलायन/ स्थलांतर केले. हे करताना त्यांच्या सोबत त्यांचे काही कट्टर अनुयायी सुद्धा आले. ते अनुयायी म्हणजे पहिले इस्लाम वर इमान आणलेले लोक त्यांचा उल्लेख सबीकाः असा होतो. त्यांना मुहाजीरून / मुहाजिर असे गौरवाने उल्लेखले जाते. अर्थात असे लोक जे अल्लाह चा संदेश प्रसारित करण्याच्या साठी आपले स्थान सोडून प्रवासात अत्यंत यातना सहन करत हिज्राः करत आहेत. 

आता हि सर्व निष्कासित मंडळी मदिना इथे आली. इथे त्यांना ज्या स्थानिक लोकांनी या मुहाजीरून ना स्थायिक होण्यास मदत केली ते अन्सार. या अन्सारांचा सुद्धा अत्यंत गौरवपूर्ण उल्लेख होतो कारण त्यांनी यांना आश्रय मिळवून दिला आहे. 

कालांतराने या अन्सारांनी सुद्धा इस्लाम कुबूल केला आणि त्यांचे एक छोटे सैन्य तयार झाले त्यांनी मदिना जिंकली आणि या जेत्यांनी उलटा हल्ला मक्केवर केला आणि मक्का सुद्धा काबीज केली. हा अन्सारांनी मुहाजीरून होऊन केलेला हिज्राः झाला. 

मुहाजीरून जे होते त्यांच्या वंशजांच्या पैकी लोकच पुढे खलिफा झाले आहेत. 

हा भाग आहे मोहम्मद पैगंबर यांच्या आयुष्यातील. इस्लाम चा जन्म आणि विस्तार कसा झाला हे समजून घेण्याच्या साठी हे ठीक आहे. 

यात कुराण मध्ये हिज्राः करणे याचा उल्लेख गौरवपूर्ण आहे. जो आपले घरदार आप्तेष्ट सोडून अल्लाह चा संदेश पसरवण्याच्या साठी हिजरा करतो त्या प्रत्येक स्त्री पुरुषाला त्याने सहन केलेल्या या यातनांच्या प्रमाणात प्रचंड लाभ अल्लाह मिळवून देईल. त्यांची सगळी पापे क्षमा केली जातील. ( हा भाग नेहमीच महत्वाचा असतो ). त्यांचे मुळस्थान जे आहे तिथून जी हिज्राः ते करतील त्या नवीन स्थानी त्यांना अधिक सुख, समृद्धी आणि ऐश्वर्य अल्लाह प्रदान करेल.तात्विक पातळीवर हे सगळे अत्यंत चांगले आणि लोभस वगेरे वाटू शकतो. 

पण या पण मध्ये खूप मोठी मेख आहे. 

हिजरा हि संकल्पना अत्यंत साळसूद, प्रेमळ आणि मानवीय वाटेल तत्वाच्या पातळीवर आहे सुद्धा. परंतु या संकल्पनेचा शस्त्र म्हणून वापर करून इस्लाम फोफावला आहे. 

तुम्ही कोणत्याही मुस्लीम व्यक्तीचे कोणतेही कृत्य अभ्यासा तो कुराण च्या बाहेर नाही. भले त्या कुराणातील विचार १३०० वर्ष जुने असतील आणि आजच्या मानवी समाजाच्या दृष्टीने पराकोटीचे चुकीचे असतील तो त्याचेच पालन करतो. 

आणि 

हि गोष्ट आधुनिक जगाच्या साठी फार मोठी डोकेदुखी आहे. 

कसे ते समजावून सांगतो. हे लोक कुठेही आश्रय मागायला येताना आम्ही शरणार्थी आहोत. मुहाजीरून आहोत असे सांगतच येत असतात. त्यांनी तिथे पाय ठेवण्याच्या पूर्वी त्यांच्या बद्दल कणव निर्माण करण्याचे कार्य अन्सार करतात. त्यामुळे त्यांना तिथे आले कि शरणार्थी म्हणून आश्रय मिळतो.

आणि 

नंतर सुरु होतो क्रूर खेळ. आपली लोकसंख्या भयानक वेगाने वाढवत नेण्याचा. त्या साठी स्थानिक स्त्रियांशी लग्न करा. आपले उत्पादन वाढवा. स्थानिक लोकांना आपल्या धर्मात ओढा. या कार्यात सुद्धा अन्सार सामील असतातच. एका टप्प्यावर अन्साराना सुद्धा आपल्या धर्मात ओढून घ्या. एकदा आपली लोकसंख्या वाढली कि शस्त्रबळावर तो देश ताब्यात घ्या. आजकाल तर लोकशाही आहे.. आपल्या मागण्या आपल्या लोकसंख्येच्या बळावर लादत लादत नालायक राज्यकर्त्यांना सत्ता सोपान चढू द्या. ते सत्तेवर आले कि त्यांच्या कडून मोबदला वसूल करा. पुढील निवडणुकीत अजून समर्थन करा, अजून मोबदला वसूल करा. ज्या वेळी आपण पूर्ण ताकदवान होऊ त्यावेळी तो देश इस्लामिक राष्ट्र करून टाका. 

काही उदाहरणे पहा.

१) पर्शिया उर्फ आजचा इराण. या देशाने फक्त १०० मुस्लीम शरणार्थी / मोहजीर / मुहाजीरून यांना आपल्या देशात आश्रय दिला. आज इराण हे इस्लामिक राष्ट्र आहे. 

२) सिरीया मध्ये गृहयुद्ध पेटले कि त्या एका छोट्या बालकाचा फोटो सर्वत्र व्हायरल करून युरोप च्या मानवतेला आवाहन करून सिरीयन शरणार्थी येण्याची पृष्ठभूमी तयार केली गेली. सिरीयातून येणारा शरणार्थी/ मुहाजीरून हा तुर्कीच्या मार्गेच युरोपात जाणार आहे. पण त्याला तुर्की ठेवून घेत नाही बर का. हि गम्मत लक्षात घ्या. सगळी पब्लिक स्पेन आणि बाकी युरोपात धाडली. आता तिथे पोचले कि त्या मुहाजीरून यांनी आपली नखे आणि दात दाखवायला सुरुवात केली आहे. आणि अक्ख्या युरोपात काही काळाने इस्लामी अंमल निर्माण होण्याची शक्यता निर्माण झाली आहे. 

३) केरळ च्या किनार्यावर मुस्लीम व्यापारी म्हणून आले. त्यांनी स्थानिक स्त्रियांशी लग्ने केली. तिथे तर मातृसत्ताक. त्यांना अधिक सोपे गेले. आज केरळ जवळ जवळ मुस्लीम आहे. तिथे हिंदू संपू लागले आहेत, ते ख्रिश्चन लोकांना सुद्धा संपवू लागले आहेत. 

४) आपल्या देशात सुद्धा खैबर खिंड ओलांडून ते अन्सार / त्या काळातील राजांवर असंतुष्ट हिंदू किंवा बौद्ध भिक्कू मंडळांच्या मदतीने आपल्या देशात आले. पाय ठेवला कि पहिल्यांदा त्यांनी अन्सारांचा वध केला कारण ते काफिर होते आणि धर्म बदलायला तयार नव्हते. नंतर तलवारीच्या बळावर आणि क्रूर पद्धतीने त्यांनी आपले हातपाय संपूर्ण देशभर पसरले. 

५) विजयनगर साम्राज्याच्या चारही बाजूला मुस्लीम शाही होत्या. पण या सगळ्यांना रामदेवराय यांनीच प्रचंड मदत करून समृद्धी प्रदान केली होती. रामदेवराय चा सेनापती मुस्लीम होता, त्याच्या सैन्यात मुस्लीम होते. या चार शाही आपापसात लढणे थांबवून एक झाल्या. त्या सेनापतीला फितूर केले. आपापसात रोटीबेटी व्यवहार करून घेतले आणि एकाच वेळी विजयनगर वर हल्ला केला. सेनापतीने दगा दिला आणि विजयनगर साम्राज्य उध्वस्त झाले. या पाच जणांनी मिळून त्याचे लचके तोडले. 

६) स्वातंत्र्याच्या नंतर आपल्या देशात आजपर्यंत पाकिस्तानी आणि बांगलादेशी आणि रोहिंग्या मुसलमान नागरिक बेकायदेशीर पद्धतीने येतच आहेत. कारण का ? त्यांना सुद्धा माहिती आहे मुस्लीम राष्ट्र हे समृद्ध असूच शकत नाही. तेथील सर्वाधिक फाटकी मंडळी इकडे मुद्दामून हाकलली जातात. ते तर मुहाजीरून होतात, अर्थात धर्माचे सेवक. इकडील कोन्ग्रेसी नेते , सरकारी अधिकारी आणि स्थानिक मुस्लीम मंडळी अन्सार होतात आणि यांचा मार्ग प्रशस्त करतात. हि मंडळी इथे येऊन हात पाय पसरवतात

आणि 

यांना भविष्यात हा देश काबीज करायचा आहे. 

आता यातील उलट मुहाजीरून बघा बर का. भारतातील मुस्लीम अपना मुल्क म्हणून पाकिस्तानात गेले. त्यांना तिथे अत्यंत वाईट वागणूक त्यावेळेस पासून आजवर दिली गेली आहे. त्यांची तिथे एक मोहाजिर कौमी मुव्हमेंट आहे. त्या लोकांना बेसिक अधिकार सुद्धा नाकारले कारण ते मुस्लीम राष्ट्रात परत आले आहेत. 

तुम्हाला रोहिंग्या मुस्लिमांना स्वीकारलेला एकही मुस्लीम देश दिसणार नाही. 

रोहीन्ग्यांना म्यानमार ने पळवून लावले हे खरेच आहे. पण त्यांना अन्य देशात सेटल करण्याचा अट्टाहास का ? तर ते मुहाजीरून आहेत. त्यांना इस्लामिक देशात घ्यायचे का नाही ? ते तिथे ओझे आहेत. 

इस्लामिक राष्ट्रात इस्लामिक शरणार्थी मान्यच नाही. त्याने ज्या भूमीवर आहे तिथे लढून इस्लामिक राष्ट्र निर्माण करावे किंवा अन्य गैर इस्लामी मुल्क मध्ये जाऊन तिथे इस्लामिक राष्ट्र निर्माण करावे. 

आणि 

हा संदेश त्याला मोहंमद पैगंबर यांचे जीवन आणि कुराण देते. 

CAA ला प्राणांतिक विरोध का होतो आहे ते समजून घ्या. प्रत्येकाला १०० % माहिती आहे कि भारतातील एकही मुस्लिमाचे याने नुकसान होणार नाही. होऊच शकत नाही. 

पण 

१) CAA मुळे जो इतकी वर्ष अव्याहत चालू असलेला हा हिज्राः होता तो कायमचा बंद पडणार आहे. 

२) इस्लामिक पाकिस्तान, बांगलादेश आणि अफगाणिस्तान मधील उरलेले काफिर आहेत त्यांना मारून टाकण्याची त्यांना धर्मांतर करायला लावण्याची आणि त्यामुळे इस्लाम ची सेवा करून आपल्या पापांच्या पासून मुक्ती मिळवण्याची संधी कायमची संपुष्टात येणार आहे. 

३) पुढे NPR & NRC आले कि जे इथे हिज्रा करून आलेले आहेत त्यांना सुद्धा मुहाजीरून होऊन परत मूळ भूमीवर परत जावे लागणार आहे. 

४) मग इथले जे अन्सार आहेत त्यांचे सगळे प्रयत्न मातीत गेले. मग अन्सारांना सुद्धा जे पैसे मिळाले आहेत त्यांना खाल्ल्या पैशाला जगायला नको का ? 

आता तुम्ही म्हणाल दोन वेळेस खायला भिकारी असलेला पाकिस्तान काय या अन्सार मंडळींना पोसेल ?

तर हा सगळा पैसा गल्फ मधून येतो. आणि तो आपण कल्पना करणार नाही इतका मोठ्या स्वरूपात येतो. त्यांच्या धर्माची शिकवण आहे जकात द्या २.५ ते ५ % तुमच्या उत्पन्नाच्या. पेट्रो डॉलर मध्ये लोळणार्या मंडळींचे २.५ % सुद्धा काही कोटी डॉलर्स असतात. त्या बळावर ते काहीही करू शकतात. 

ते न्यूज च्यानेल्स चालवतात, राजकीय पक्ष पोसतात. ते तुमच्या सगळ्या यंत्रणा पैशाच्या बळावर विकत घेतात. 

एक लक्षात घ्या जे लोक पैसे फेकून युरोप चा मिडिया विकत घेऊन युरोप वर मानवी दृष्टीकोन दाखवत दबाव आणून सिरियातील मुहाजीरून घुसवू शकतात

त्यांच्यासाठी भारतीय मिडिया आणि आपले राजकीय पक्ष विकत घेणे किती कठीण असेल ? 

आता जी मंडळी शाहीन बाग मध्ये बसली आहे. त्यांची दोन उद्दिष्टे आहेत. 

१) जमले तर CAA रद्द करायला लावायचा. म्हणजे हिज्राः चालू राहील. भविष्यातील इस्लामिक राष्ट्र निर्माण होण्याचा मार्ग मोकळा राहील. 

२) नाहीच जमले तर कमीत कमी NPR & NRC होऊ द्यायचे नाही जेणेकरून इथे आलेल्या मुहाजीरून ना तरी देश सोडून जावे लागणार नाही आणि त्यांची लोकसंख्या आणि स्थानिक लोकसंख्या मिळून मताच्या राजकारणात आपले अस्तित्व टिकवून ठेवू शकतील, भविष्यात संधी मिळाली तर परत आपला आवडता सत्ताधीश बसवून परत जुना खेळ सुरु करता येईल. 

हा लेख आता एकदा वाचून झाला आहे. परत एकदा सुरुवातीच्या पासून वाचा. म्हणजे CAA घोषित झाल्यापासूनचा घटनाक्रम त्यातील अन्सार आदी सगळे मुद्दे लक्षात येतील. 

आता याचा पुढचा भाग. 

जे मुहाजीरून आलेले आहेत त्यांनी त्यांची भूमी सोडली आहे. अर्थात त्यांना मागे जायला संधीच नाही. आता इथेच तगणे आहे. मग इथे असणारे जे अन्सार आहेत त्यांनी सांगितलेले सगळे करणे यांना भाग आहे. आता जो अन्सार असेल तो जर मुस्लीम असेल तर त्याने जर सांगितले काफिर मारून टाका. त्यांना ते करणे भाग पण आहे आणि आनंदाचे काम पण आहेच कारण ते धर्मकार्य आहे. 

अन्सार चा फायदा काय ? या पद्धतीने जर केलेले कट यशस्वी होत गेले तर भविष्यात इथे इस्लामिक राज्य निर्माण होऊ शकते. स्थानिक अन्सार ला नैसर्गिक रित्या मुहाजीरून नेता म्हणून स्वीकारतील आणि स्थानिक काफर आणि अन्य मुस्लीम सुद्धा अन्सार ला नेता म्हणून स्वीकारतील. अर्थात या भविष्यातील इस्लामिक राजवटीमधे तो नेता होऊ शकतो. 

जर हा डाव फसला आणि मुहाजीरून दंगा करताना पकडले गेले, त्यांना शिक्षा झाली , मारले गेले. अन्सार ला काय फरक पडतो ? 

त्यामुळे दिल्ली दंगलीच्या मध्ये भारतीय दंगेखोर सापडण्याची शक्यता धूसर आहे. असले तरी मुहाजीरून असतील जे कदाचित बेकायदेशीर रहात असतील. 

तो पुढील मुहाजीरून लोकांच्या टोळीला याच पद्धतीने स्थायिक व्हायला मदत करून हेच काम चालू ठेवू शकतो. 

पण 

CAA तो मार्ग बंद करते आहे म्हणून तमाम अन्सार अस्वस्थ आहेत. NPR & NRC हे इथल्या मुहाजीरून ना हाकलून देणार आहे. मग इथल्या अन्सार ना आपली काफिरांच्या विरुद्धची लढाई घरातील आपली माणसे लावून लढावी लागेल. त्याला फुकट मारायला आणि मारायला माणसे मिळणार नाहीत. 

अन्सार मंडळींचे हे खरे दुक्ख आहे. 

हे सगळे व्यवस्थित समजून घेतले तर आपण कोणत्या भूसुरुंगांच्या सहवासात जगतो आहेत हे समजेल

भाईचारा या शब्दाचा निम्मा भाग कसा रक्तरंजित आहे हे उमजेल. 

बर सगळे भारतीय मुस्लीम अन्सार आहेत का ? 

बिलकुल नाही. ९० ते ९५ % भारतीय मुस्लीम हे शांतताप्रेमी या देशावर प्रेम करणारे आणि CAA, NPR & NRC ला सपोर्ट करणारेच आहे. कारण त्यांना माहिती आहे यामुळे त्यांचे भलेच होईल. त्यांच्या पैकी बहुसंख्य मंडळीनी एक पत्नीत्व, परिवार नियोजन हे घोषित न करता पण गुपचूप स्वीकारले पण आहे. 

पण 

या कट्टर लोकांशी संघर्ष करण्याची त्यांची ताकद नाही म्हणून ते मौन आहेत. 

दुसरा भाग समजा या कट्टर लोकांचा कट यशस्वी झाला तर इस्लामिक राष्ट्रात राहायला त्यांना पण आवडणारच आहे. कारण यात धर्म या पातळीवर फायदे आहेत. 

तिसरा भाग तश्या इस्लामिक राष्ट्रात यांना अधिक अधिकार असतील कारण हे शिकलेले आहेत. यांना उच्च पोस्ट्स मिळतील हा पण फायदा आहे. 

चौथा भाग ते पूर्ण निरागस आहेत का ? नाही. कारण ते जकात च्या स्वरूपात जो धर्मकार्याला निधी देतात त्याचा वापर इथे होतो आहे हे त्यांना माहिती आहे पण ते मौन आहेत. 

सगळे अन्सार मुस्लीम आहेत का ? नाही 

हिंदू सुद्धा आहेत. त्यांना सत्ता मिळते, आर्थिक लाभ मिळतो, सामाजिक स्टेटस मिळते, पुरोगामी म्हणून मिरवता येते. 

हे सगळे वाचल्याच्या नंतर आपल्या समाजात वावरणारे भाईचारा प्रेमी मंडळींचे नक्की पाय कसे अन किती मातीचे आहेत हे लक्षात आले असेल. 

सुप्त अन्सार ते हिंदू आहेत जे या भाईचारा gang च्या प्रेमात पडून आपले मत बनवतात आणि या लोकांना मते देऊन सत्ता मिळवून देतात. 

हे आहे उघडे नागडे कटू सत्य. पटले तर घ्या नाहीतर सोडून द्या.


तळटीप : या लेखाला लिहून एक वर्ष झाले आहे . या एक वर्षात घडलेल्या घटना बघा.. 


१) रोहिंग्या मुसलमान CAA कायद्याच्या मुळे देशाच्या बाहेर हाकलले जात आहेत. 

२) युरोप ला फसवून तुर्की ने अन्सार होऊन सिरीयन मुस्लीम घुसवले त्यांनी तिथे धुमाकूळ सुरु केला आणि तिथल्या सरकारांनी आता त्यांना वेसण घालायला सुरुवात केली आहे. डेन्मार्क , फ्रांस आणि स्वीडन ने आपले कायदे कठोर करायला सुरुवात केली आहे. अर्थात मी लेखात मांडलेला प्रत्येक मुद्दा सत्य होताना दिसतो आहे. 

३) नरेंद्र मोदी यांनी CAA कायदा आणणे म्हणजे कुफ्र करणे आहे. कारण गेली १३०० वर्ष ज्या मोडस ऑपरेंडी चा वापर करत इस्लाम ने हात पाय पसरले होते त्या मोडस ओप्रेंडी वर मोदी यांनी कायदेशीर आघात करून दाखवले आहे आणि त्यामुळे जगभरातील सर्वच देश आता आपले कायदे कठोर करण्यावर लक्ष देतील. 

४) इस्लाम चे हे स्वरूप प्रगत इस्लामी राष्ट्रांना सुद्धा मान्य नाही त्यामुळे सौदी आणि यु ए ई सारख्या देशांनी ज्यू लोकांशी असलेले वैर विसरून इस्त्रायल शी मैत्री स्थापन केली आहे. सौदी मध्ये कुराण चे आजच्या कालानुरूप स्वरूप आणले जाते आहे. 

५) परंतु पाकिस्तान बांगलादेश सारखे भुके नंगे देश आणि भारतातील सेकुलर अन्सार जागतिक घडामोडींच्या पासून अनभिज्ञ होऊन अजूनही जुन्याच चाली वापरण्याचा प्रयास करत आहेत.